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अक्षय तृतीया का पौराणिक इतिहास: सतयुग के आरंभ से महाभारत के प्रसंगों तक, जानें इस दिन का हर गहरा रहस्य

Tuesday, 7 April 2026 | April 07, 2026 IST Last Updated 2026-04-06T19:53:07Z

अक्षय भारत : 07 अप्रैल 2026

भारतीय पंचांग में 'अक्षय तृतीया' को केवल शुभ कार्यों की शुरुआत या खरीदारी का दिन नहीं माना जाता, बल्कि शास्त्रों में इसे 'युगादि तिथि' की संज्ञा दी गई है। इसका अर्थ है वह पवित्र समय, जब युगों का परिवर्तन हुआ। सतयुग से लेकर द्वापर के महाभारत काल तक, इस तिथि ने ब्रह्मांड की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं को अपने भीतर समेटा है। आइए जानते हैं वे 5 गहरे रहस्य, जो इस दिन को वर्ष की सबसे शक्तिशाली तिथि बनाते हैं।

1. सतयुग और त्रेतायुग का दिव्य सूत्रपात
मत्स्य पुराण के अनुसार, अक्षय तृतीया ही वह क्षण है जब काल चक्र बदला और सतयुग व त्रेतायुग का आरंभ हुआ। इसे 'कृतयुगादि' तिथि भी कहा जाता है। मान्यता है कि इस दिन किया गया कोई भी आध्यात्मिक कार्य 'अक्षय' हो जाता है, यानी उसका पुण्य कभी समाप्त नहीं होता, क्योंकि इसकी ऊर्जा सीधे युग परिवर्तन से जुड़ी है।

2. धरती पर माँ गंगा का पावन अवतरण
वाल्मीकि रामायण के बालकांड की कथाओं के अनुसार, राजा भगीरथ की सदियों पुरानी तपस्या इसी दिन सफल हुई थी। माँ गंगा स्वर्ग की पवित्रता लेकर इसी तिथि को पृथ्वी पर उतरी थीं। उनके स्पर्श से राजा सगर के साठ हजार पूर्वजों को मोक्ष प्राप्त हुआ। यही कारण है कि इस दिन गंगा स्नान को अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्यकारी माना जाता है।

3. भगवान परशुराम का प्राकट्य उत्सव
महाभारत के वन पर्व और कालिका पुराण के उल्लेखों के अनुसार, अक्षय तृतीया भगवान विष्णु के छठे अवतार, परशुराम जी की जन्मतिथि है। माता रेणुका के गर्भ से अवतरित परशुराम जी को 'चिरंजीवी' माना जाता है। उनकी अमरता के कारण ही इस दिन की शुभता को भी 'अक्षय' यानी कभी न खत्म होने वाला माना गया है।

4. महाभारत का लेखन और 'अक्षय पात्र' का वरदान
साहित्यिक और धार्मिक दृष्टि से यह दिन अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसी दिन महर्षि वेदव्यास ने भगवान गणेश की सहायता से महाभारत का लेखन कार्य प्रारंभ किया था। साथ ही, वनवास के कठिन समय में भगवान श्रीकृष्ण ने द्रौपदी को 'अक्षय पात्र' भेंट किया था, जिससे पांडवों को कभी अन्न की कमी नहीं हुई।

5. बद्रीनाथ धाम के कपाट और नर-नारायण की तपस्या
हिमालय की पहाड़ियों में स्थित बद्रीनाथ धाम के द्वार शीतकाल के बाद इसी पवित्र दिन भक्तों के लिए खोले जाते हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान के नर-नारायण स्वरूप ने इसी दिन अपनी कठिन तपस्या का आरंभ किया था, जो इस स्थान और तिथि को असीम आध्यात्मिक शक्ति प्रदान करता है।

अस्वीकरण (Disclaimer): इस लेख में दी गई जानकारी सामान्य सूचनाओं, धार्मिक मान्यताओं, ज्योतिषीय पंचांग और पौराणिक कथाओं पर आधारित है। 'अक्षय भारत' इनके पूर्ण सत्य होने का दावा नहीं करता है। पाठक अपनी आस्था और विवेक के अनुसार इनका अनुसरण करें।